Monday, February 27, 2012

उज्जैन की उन्नती (Ujjain Ki Unnati)

उज्जैन की उन्नती
१.९.१९५३
 देखो दुनिया की बहार, मेरे आलीजा सरकार|
  
 उज्जैन शहर है आला, जिसका किल्ला है निराला,
पहरे लगते बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
उज्जैन शहर है आला, जिसका मील है निराला,
हुल्लड़ होती बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
उज्जैन शहर है आलाजिसका मंदिर है निराला,
पूजा होती बेशुम्मारमेरे आलीजा सरकार||
उज्जैन शहर है आलाजिसका चौक है निराला,
गुंडे फिरते बेशुम्मारमेरे आलीजा सरकार||
 
  उज्जैन शहर है आला, जिसकी कोतवाली निराला,
चोर पिटते बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
उज्जैन शहर है आला, जिसका स्टेशन है निराला,
टिकटें बिकती बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
 
उज्जैन शहर है आला, जिसका पोस्ट ऑफिस निराला,
चिट्ठी आती बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
उज्जैन शहर है आला, जिसमें गटरें है निराला,
झाड़ू लगती बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
उज्जैन शहर है आला, जिसमें मोहल्ले हैं निराला,
लड़के भगते बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
उज्जैन शहर है आला, जिसमे कॉलेज है निराला,
लड़के पढ़ते बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
उज्जैन शहर है आला, क्षिप्रा तीरथ जहाँ निराला,
यात्री न्हावे बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
उज्ज्जैं शहर है आला, जिसमे राजमहल है निराला,
चक्रित चितजन बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
उज्जैन शहर है आला, जिसकी संध्या बड़ी निराला,
पक्षी उड़ते बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
 
उज्जैन शहर है आला, कालियादेह महल निराला,
सैर सपाटे बेशुम्म्मार, मेरे आलीजा सरकार||
उज्जैन शहर है आला, जिसकी होली सुभग विशाला,
गेरें निकलें बेशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार||
उज्जैन शहर है आला, जिसमें दीपावली निराला,
उत्सव होते बुशुम्मार, मेरे आलीजा सरकार|
देखो दुनिया की बहारमेरे आलीजा सरकार|
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Saturday, February 25, 2012

वेदान्त ज्ञान महिमा (vedaant Gyaan Mahimaa)


वेदान्त ज्ञान महिमा

१६.११.१९२९
ज्ञान बिन सत्यासत्य, उर में विवेक नाहीं
ज्ञान बिन धर्म भाव, पास ही न आयेंगे |
ज्ञान बिन भक्ति कहाँ, भक्ति बिन ध्यान कहाँ,
ध्यान बिन ईश की कृपा, 'कृष्ण' पायेंगे |
ज्ञान बिन मोह, मद, मान, ममता लुभात,
ज्ञान बिन सारे सुख साज, यों ही जायेंगे |
ज्ञान बिन मोक्ष, योग, भोग का विवेक कहाँ,
ज्ञान बिन जीव कर्मबंधन बढ़ायेंगे ||
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लखातु है- (Samasyaa- Lakhaatu Hai)


समस्या - "लखातु है"
(हिन्दी के प्रतिरोधी के प्रति)
८.१.१९३२
फारस निवासी सदा फारसी को चाव राखे,
चीन वासी चीन की भाषा न दुरातु है|
जर्मन निवासी जर्मनी नी भाषा भूले नहिं,
फ्रांस परिभाषी फ्रांस भाषा लिख पातु है ||
अर्ब देश मानी भाषा अर्बी को साधे सदा,
बरमी न ब्रम्हदेश लीपी विसरातु है|
एक हिंद देश की अनोखी रीति देखी 'कृष्ण',
आंग्ला भाषा सीख हिन्दी लीपी दुलखातु है||||

जाने ना मराठी सो तो महाराष्ट्रवासी नाही,
 बांग्ला न जाने सो न बंगाली कहातु है |
मद्रासी न जाने ऐसो मद्रासी वासी कहा,
गुरुमुखी छांडे सो न पंजाबी जनातु है ||
सिंधी को न साधे सिंध देश को कलंक सोई,
संस्कृत दुरावे वेदधर्म बिन्सात है|
'कृष्ण' देशभाषा देउल्खावे देशभक्त कहा
हिन्दी को बिसारे सो तो हिन्दू ना लखातु है ||||

हिन्दुधर्म चिन्ह नाही धारत कपारये जो,
हिन्दू कीन्तु वेशभूषा छोरि हरखातु है |
हिन्दूसे न केस सीस हिन्दुसी न मुच्छधारे,
सीस खोलि हात बाट जात ना लजातु है|
हिन्दू की समुन्नती को मोह उर दूर करे,
हिन्दुधर्म गृन्थ सीखवेते सकुचातु है|
'कृष्ण' हिंद लेखनी ते हिन्दी लिख लाज करे,
हिन्दी दुलखात सो अहिन्दी लखातु है ||||

खुलो सीस घूमे ताते बंगवासी जैसो दिखे,
सफाचट्ट मुछ्वारो सूतकी लखातु है |
कोट पतलून नेकटाई से तो आंग्ल्वासी,
अर्धकट्ट मूछ्धारी फ्रेंच बनजात है ||
अंगरेजी लेखक होय आंग्ल भाषा प्रेमी लसे,
हस्ताखर देखूं तो अहिंदू सो जनातु है |
'कृष्ण' अस बहुरूपी हिन्दी काव्य करणहार,
हिन्दी ना लखात ना अहिन्दी सो लखातु है ||||
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Tuesday, February 21, 2012

Shreekrishna Joshi 'Nakshe Navees' (स्व. श्री श्रीकृष्ण जोशी 'नक़्शे नवीस')

स्व. श्री श्रीकृष्ण जोशी 'नक़्शे नवीस

 
"गुणागार सागर सरसनगर नागरिक जान,

जिगर विगर गर जासु हैनगर नागरिक जान ||"



पूरी कविता के लिए क्लिक करें:http://shreekrishnajoshi.blogspot.in/2012/01/blog-post_25.html

Sunday, February 19, 2012

ॐ जय शिव ॐकारा (Om Jai Shiv Omkara)


ॐ जय शिव ॐकारा

8.8.1955

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उजाड़ू ढोर आते हैं (Ujaadoo Dhor Aate Hain)

उजाड़ू ढोर आते हैं
ज़रा होशियार हो चलना,
उजाड़ू ढोर आते हैं ||
उन्हें तुम छेड़ना मत हो,
लुभाना किंचित भी मत हो |
बिगड़ जाते हैं वे पल में,
बिखर जाते हैं छिन-छिन में |
हिय को व्याकुल करते हैं,
उजाड़ू ढोर आते हैं ||

ज़रा भी हार नहीं खाते,
हिये में ज़रा न शरमाते |
सदा रहते हैं गरमाते,
राग रंग पर के नहिं भाते |
अकाद में फूलते फिरते हैं,
उजाड़ू ढोर आते हैं ||

सीस पर वक्र नुकीले शस्त्र,
पाँव में चार खुरीले अस्त्र |
देह पर बालदार हैं वस्त्र,
अटल है स्फूर्ती वीराज हस्त्र |
स्वार्थ जिनको अपना प्रिय है,
उजाड़ू ढोर आते हैं ||
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“The earth holds the fool and holds the wise, endures that good and bad dwell (upon her); she keeps company with the boar, gives herself up to the wild hog.”- Athrva Veda





Friday, February 17, 2012

होलिकोत्सव पर नेक सलाह (Holikotsav Par Nek Salaah)

होलिकोत्सव में नेक सलाह
१.१.१९३०

- दोहा-
उल्टी बोली है नहीं, सुलटी ही कहलाय,
कान मूँद सुन लीजिये, ननि कोऊ दरपाय ||
-छंद-
देशहित चाहो तो चांदी चहुँ और से ला,
अपनी ही मंडली में दान कर दीजिये |
मित्र भाव चाहो तो, मोटर घर माहि राखि,
बड़े बड़े अफसरों को शोकिया  घुमाईये  |
मान यदि चाहो तो हाथ से मिलाय हाथ,
अपनी मरालता काक में मिलाईये |
गौरव का शौक हो तो कूद कूद लेक्चर झाड़,
कार्यकारी युवकों को गधा बनाइये |
धन्यवाद् चाहो तो चंदा दे सोसायटी को
समाचार पत्रों के कॉलम रंगाइये |
नेकनामी चाहो तो खुशामती की पीठ ठोंक
बनकर सफ़ेद पोश फूट को मचारिये |
वाह वाह चाहो तो छल से दिखाय दांत
कविता की कालिमा कपार पे लगाइए |
- दोहा-
होली का उपहास है, कविकुल की वरभेट
कलियुग का श्रृंगार है हंसमुख जन की टेंट ||
"कृष्ण" न टूक हंसिये कहूँ दिखि जैहें दन्त
मनमोदक चख लीजिये, मदकारक मकरंद ||
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म्हारी डाबली खोवाणी (Mharee Dablee Khowanee)




म्हारी डाबली खोवाणी,
कोई ने लादी होवे तो दीजो जी,
म्हारी डाबली खोवाणी ||
रूपरंग नी घणी सुहाणी,
मन मोहन मोहाणी,
प्रिय परिपूर्ण प्रेम की खाणी,
सबने प्रियतम जाणी || म्हारी डाबली खोवाणी

भरी नासका नयन लुभाणी,
केसरिया रंगराणी,
नयन नासिका रस बरसाणी,
प्रिय परिचित पेचाणी || म्हारी डाबली खोवाणी

खाली होवे तो फिर भराणी
सब जन चित्त चुराणी,
दुखी दीन की मति भुर्माणी,
बारम्बार लुभाणी || म्हारी डाबली खोवाणी

हाट बाट में भोग भवन में,
अक्षय सुख की खाणी,
भरी जेब मां टटोल जाणी,
हिरदा की हरखाणी || म्हारी डाबली खोवाणी

योगी रोगी भोगी के प्रिय
प्रेमी की रजराणी,
सज्जन के सन्मान दिवाणी,
दुःख में धीर धराणी || म्हारी डाबली खोवाणी

शीत उष्म वर्षा ऋतू रोचक,
सो तो मगज जगाणी,
लोक प्रियता प्रेम बधाणी,
अप्रिय मति चकराणी  || म्हारी डाबली खोवाणी

क्लेश कष्ट किल्मिष मिटवाणी,
रोचक रंग रमाणी,
मित्रामित्र प्रेम परिचाणी,
करे अकल के शाणी || म्हारी डाबली खोवाणी

धृति धीरज धोरण द्युति लाणी,
कपट कलंक कटाणी,
खल छल बल अज्ञान भुलाणी,
चोर जार छकवाणी || म्हारी डाबली खोवाणी

आगम निगम रोच्य दिखलाणी,
नित्यानित्य सिखाणी,
अतिहित अनहित परिचय पाणी,
लोका लोक रमाणी || म्हारी डाबली खोवाणी

जिसके कोई न पराई जाणी,
प्राण प्रिय सबने माणी,
कोमल करते कृपा कराणी,
काबे ईने नहीं झटकाणी || म्हारी डाबली खोवाणी

भाव भव्या भाव विभव लचाणी,
यजन भजन रूचि लाणी,
"कृष्ण" भ्रमर अभिमान भुलाणी,
हिरदा ने हरखाणी || म्हारी डाबली खोवाणी

म्हारी डाबली खोवाणी,
कोई ने लादी होवे तो दीजो जी,
म्हारी डाबली खोवाणी ||
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Tuesday, February 14, 2012

भांग महिमा (Bhaang Mahimaa)

भांग महिमा
  

जाके खरीदी अरु मोल भयो पैसो,
सो चुकायदी न लाके घर ताहि को सिकाई  है |
सेक के गलायदीन घंटेभर बाद ताहि,
छान साफ़ कीन्ही अरु सिल्ली वे धराई है||
काली मिर्च लायके छदाम की मिले तामे,
कासनी बादाम एला आदि भी मिलाई है |
शक्कर अरु दूध में मिलाई तब नीकी भई,
विजया है निराली जाकी जगत प्रभुताई है ||
शंकर ने याही को विजया नाम दीनो सो,
दें विजय सर्वदा प्रताप तिहू काल में |
दूजो नाम याको तो विचार तरंगिणी है,
जासो नर डूबत है विचार तरंग ताल में |
शिवजी ने सिद्ध कियो योग केवल विजयासो,
देवे सो विजया आनंद कलिकाल में |
विजया के तीन वर्ण प्रत्येक में एक गुण,
विशुद्धता जय अरु याजनता हाल में ||
गांजे में दुर्गुण तासो इन्द्रिय शिथलायजाय,
आफू की पीनक तन छीजकसी जानी है |
कुछ्ला बिछ नाग आदि है पदार्थ दुर्विष्युक्त,
तिनके तो सेवन से शरीर की हू हानी है |
पंचरत्न नवरत्न एकादशरत्न की छनाई
भांग तामें तो विजया अपमानी है |
निज विजया छानी तिन सुख अवधी मानी
पुनि तासु कोऊ वस्तुको न अति सुखदा जानी है ||

Monday, February 13, 2012

झूम रही है डाली (Jhoom Rahee Hai Daalee)

zzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzz
zzzzzz झूम रही है डाली zzzzzz
zzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzz
१२.९.१९३४
सिन्धु पिता से निकल पिया घर चली वधूटी बाली,
सावन की बदरी नभपथ से उतरी काली काली |
बिच बिच बिजली झल झल झलके हीर माल गल डाली,
नभ से बिंदु कुसुम बरसाती उमंग भरी मतवाली ||
घनघन गगन ढोल बजवाती नभ से रस बरसाती
शुष्क जगत को सरस बनाती रवि आतप बिरसाती |
रुक रुक चली हरखती पिऊ घर सुन्दर सुखद नवेली,
प्रजाप्राण जीवन टपकाती मधुर मनोहर आली ||
त्रिविध वायु सन्देश सुनाया सुनकर सखी सयानी,
तरुवल्लियाँ विनय युक्त झुक झुक बनी समादर दानी |
हरख भरी बैठी सादर ले फूल फलों की थाली
उडि उडि नभचर स्वागत करते गावत गीत रसाली||
गिरिवर पति ने देखि समागत गृहिणी सुखद सयानी,
कर्ण मधुर मनहर मृदु गाती बही वायु रस सानी |
विविध नवल पट भूषन धारे सुन्दर देह सजाली,
ठौर ठौर पर संचित जल से भरी प्रेम की प्याली|
जहं जहं चतुरंगिणी सेना खग, मृग, अहि, झाब, सजवाली,
मेघनाथ नंदित तोपों की हुई सलामी आली |
गृह आई गृहिणी को गिरिपति सादर कंठ लगाली,
जुगनू दीपक से कर आरती हरखित अंक बिठाली ||
ठौर ठौर पर खग, मृग बैठे सुन्दर सभा सजाली,
वर मयूर का नाच रचाकर केका मधुर गवाई,
निशि में शशि नभ दीप लगाया सुभग चंद्रिका छाई |
सर में धवल कुमुदिनी की वर कुसुमित सेज लगाई |
झरनों ने नदियाँ ने हरखित कलकल बीन बजाई,
सूंड उठा गजनी ने गा दी मंगलमयी बधाई |
फन फैलाकर नागनाथ ने सिरपर छत्र लगाली,
तरुवल्ली ने चंवर डुलाये झूम रही है डाली ||
zzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzz

भूलों में (Bhoolon Mein)


zzz भूलों में zzz
२८.१०.१९२७

धरणी धन जन धाम मान पर झगडा बढ़ता जाता है,
मेलजोल घटते घटते सब ठौर विरोध सुनाता है ||
निसिदिन संपत्ति का क्षयकर अनुकूल मिले प्रतिकूलों में,
मिटी जा रही जाति {देश} किन्तु तुम भूल रहे हो भूलों में ||
कला, हुनर, विद्या की घटती बीमारी की बढ़ती है,
देशी माल विदेशी बेचें देशी कला विनसती है |
धर्म हमारा भूल रहे हैं भाव भक्ति है चूल्हों में,
मिटी जा रही जाति {देश} किन्तु तुम भूल रहे हो भूलों में ||
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[हिन्दी साहित्य सम्मलेन ग्वालियर. ता: १८.१०.१९२७ के नोटिस के विज्ञापन द्वारा प्रकाशित.
ता: १.१२.१९२७ के ग्वालियर हि. सा.सम्मलेन के अधिवेशन के लिये पढने को भेजी]
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